कानून से बड़ा कौन? आयोजक या प्रशासन!

🎤 “जब प्रशासन ने कहा 10:30 बजे तक… तो आयोजकों ने क्यों बजाया 11 बजे तक ढोल…?”

दुर्गा पूजा के अवसर पर नया मोड़ स्थित वेस्टर्न फॉर्म में आयोजित डांडिया नाइट अब सिर्फ़ एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक कानूनी और प्रशासनिक विवाद का केंद्र बन गया है।

👉 प्रशासन ने पहले ही स्पष्ट आदेश दिया था कि कार्यक्रम रात 10:30 बजे तक ही समाप्त करना होगा।
👉 लेकिन आयोजकों ने इन आदेशों को ठेंगा दिखाते हुए कार्यक्रम को 11 बजे तक खींचा और मानो कानून से ऊपर खुद को साबित करने की कोशिश की।

💥 नतीजा ये हुआ कि जैसे ही मामला प्रशासन के कानों तक पहुँचा, एसडीओ प्रांजल ढ़ांडा ने तुरंत कदम उठाया और कार्यक्रम को जबरन बंद कराया।


⚡ प्रशासन बनाम आयोजक – असली टकराव कहाँ?

यह पूरा मामला अब शहर में चर्चा का विषय बन गया है। सवाल उठ रहे हैं कि –

  • क्या आयोजक सच में प्रशासन के आदेशों की अवहेलना कर रहे थे?
  • या फिर उन्हें किसी प्रभावशाली संरक्षण का भरोसा था, जिसकी वजह से उन्होंने इतने बड़े मंच पर नियमों की अनदेखी कर दी?
  • क्या प्रशासन की सख़्ती सिर्फ़ दिखावा थी, क्योंकि अगर वे चाहें तो पहले ही कार्रवाई कर सकते थे?

👮 प्रशासन का पक्ष

एसडीओ चास प्रांजल ढ़ांडा ने साफ कहा:
“हमारा उद्देश्य है कि धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम शांति और नियमों के तहत पूरे हों। आयोजकों को समय सीमा का पालन करना चाहिए था।”

लेकिन जनता पूछ रही है –
👉 अगर उद्देश्य यही था, तो देर रात तक कार्यक्रम चलने ही क्यों दिया गया?
👉 प्रशासन ने 10:30 बजे की सीमा पार होते ही तुरंत कार्रवाई क्यों नहीं की?
👉 क्या किसी के दबाव में प्रशासन आखिरी वक्त पर हरकत में आया?


🥁 आयोजकों का पक्ष – मनमानी या लापरवाही?

कार्यक्रम से जुड़े सूत्र बताते हैं कि आयोजकों को भी पता था कि समय सीमा 10:30 बजे तक ही है।
फिर भी भीड़ और मनोरंजन के नाम पर कार्यक्रम को बढ़ाया गया।
कई लोग इसे आयोजकों की मनमानी और कानूनी लापरवाही मान रहे हैं।

कुछ लोगों का कहना है –
👉 “त्योहार का समय है, थोड़ी छूट मिलनी चाहिए।”
👉 लेकिन दूसरी तरफ़ सवाल है – त्योहार के नाम पर कानून तोड़ने का हक़ किसे और क्यों?


🗣 जनता की प्रतिक्रिया

सोशल मीडिया और पब्लिक चर्चा में लोग दो हिस्सों में बँट गए हैं:

✅ एक वर्ग कह रहा है –
“आख़िर त्योहारों में थोड़ी देर और चलने से क्या नुकसान? लोग खुशी मना रहे थे, प्रशासन को इतना सख़्त नहीं होना चाहिए।”

❌ दूसरा वर्ग सवाल कर रहा है –
“अगर नियम सबके लिए हैं तो आयोजक अपवाद क्यों बनें? क्या आम आदमी देर रात तक लाउडस्पीकर बजा सकता है? अगर आम जनता पर कार्रवाई होती है तो आयोजक क्यों बचेंगे?”


⚡ असली विवाद – त्योहार या नियम?

यह पूरा घटनाक्रम अब एक गंभीर बहस को जन्म दे रहा है –
👉 क्या त्योहारों के नाम पर नियमों को तोड़ने की छूट दी जानी चाहिए?
👉 या फिर कानून सबके लिए बराबर होना चाहिए – चाहे वो आयोजक हों या आम जनता?

👉 साफ है कि इस बार नियमों की अवहेलना हुई है, सरकारी आदेशों का पालन नहीं किया गया है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है – क्या प्रशासन आयोजकों पर कानूनी कार्रवाई करेगा या फिर यह मामला चुपचाप शांत कर दिया जाएगा?


🎯 निष्कर्ष

वेस्टर्न फॉर्म में हुई यह घटना सिर्फ़ एक डांडिया नाइट का विवाद नहीं, बल्कि एक बड़ा सवाल खड़ा करती है –
“क्या नियम तोड़ना त्योहार की आज़ादी है, या फिर त्योहारों की आड़ में कानून की अवहेलना?”

👁‍🗨 अब देखना होगा कि प्रशासन इस पर कड़ा कदम उठाता है या फिर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा

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